Sunday, July 10, 2022

Ghunghat Ke pat Khol Re (Vedant)

 

मानव जन्म क्यों ? जो आत्माएं कर्म के आधार पर प्रभु समर्पित हो उद्विकसित(evolve) हो जाती हैं,उन्हे पुरुस्कार–स्वरूप दुर्लभ मानव जन्म ईश्वर प्राप्ति या मुक्ति के आनंद प्राप्ति हेतु परीक्षा देने के लिए दिया जाता है।

(पर मानव अहम और माया के घूंघट डाल, स्वयं को सर्वसमर्थ, सर्वज्ञाता मान, अपने ही कुचक्र में फंस,गलतियां कर परीक्षाओं में असफल होता रहता है। फलतः उसे मृत्युलोक की शारीरिक और मानसिक पीड़ाओं की अग्नि में जलते रहना पड़ता है,)कबीर ने कहा है–

घूँघट का पट खोल रे, तोको पीया मिलेंगे।

घट-घट मे वह सांई रमता, कटुक वचन मत बोल रे॥

धन जोबन का गरब न कीजै, झूठा पचरंग चोल रे।

सूंने महल मे दिया जलत है, आसन सों मत डोल रे॥

जागू जुगुत सों रंगमहल में, पिय पायो अनमोल रे।

कह कबीर आनंद भयो है, बाजत अनहद ढोल रे॥


दूसरा प्रश्न - मानव जीवन को ही श्रेष्ठता का  महत्व क्यों? 

उसपर मेरा  विचार है की ,ये केवल मानव योनि है जिसे  विवेक(गलत ,सही में भेद)की क्षमता और तर्कपूर्ण सोच ईश्वर–प्रद्त्त है। इन क्षमताओं से वह व्यभिचारी कर्मो से दूर,स्वयं को परिपकारी कार्यों लगा कर मिथ्या सांसारिक बंधनों,कष्ट,अहम और माया से मुक्त हो सकता है।परंतु ,दुर्भाग्यवश,वह इन क्षमताओं से सुसज्जित होने के बाद भी स्वार्थवश भ्रमित हो दुरुपयोग ही करता है ।कबीर ने चेताया है की ये जन्म बहुत दुर्लभता से मिलता है ,बार बार नही मिलता इसलिए इसका सदुपयोग कर ,पीड़ाओं से मुक्त हो जा–

मानुष जनम दुलभ है, होइ न बारंबार।

पाका फल जो गिरि परा, बहुरि न लागै डार।

परमब्रह्म की सरलता और सत्ता  समझ पाना बहुत सरल है पर  हम जैसे दिग्भ्रमित तिनकों के लिए ये कहां संभव है। 

वेदांत ,उपनिषद,जगद्गुरु,नानक ,कबीर तो कहते हैं कि एक ही है जो ब्रह्म है–

ब्रह्मसत्य जगत मिथ्या , १ॐकार, अहम ब्रह्मास्मी, तत्वमसी, प्रज्ञानम ब्रह्म, अय्म आत्मा ब्रह्म

वही एक ब्रह्म  विभिन्न रूपों में जगत की तरह प्रगट होता है,ब्रह्म के ये रूप तों अस्थाई हैं,इसलिए ये मानव ,पशु ,पक्षी वनस्पति आदि रूप तो मिथ्या हैं,मात्र जन्म से मृत्यु के बीच में ही हैं।असल में तो इन सब में छुपा एकरूप स्थाई ब्रह्म ही है ,क्या मानव,क्या कीड़ा,सभी बराबर हैं,अतः इन अस्थाई रूप में भी स्थित स्थाई ब्रह्म को देखो,उसका सम्मान करो,उसको समझो क्योंकि उसका सम्मान ही तुम्हारा (तुम में स्थित सर्वशक्तिमान,सर्वसमर्थ,सर्वव्याप्त, सर्वज्ञाता,अखंड,अनंत, ब्रह्म) सम्मान है।

- Arvind Pachauri

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